ब्रह्म स्तुति - श्लोक -1
नवीन बादल-सा गहरा नीला रंग
बिजली की भाँति वस्त्र की आभा
मुखचंद्र का सौंदर्य यूँ ही कम कहाँ
उसपे गुंजा कुंडल,मोरपंख की शोभा।
मैया ने किया था कितना सुंदर शृंगार
भाँति-भाँति के रत्नों से जड़ित थे गहने
उसपे आप सजे वनफूलों की माला से
कान में भी पत्तियाँ और फूल हैं पहने।
तिरछी चितवन, त्रिभंग मादक मुद्रा
लकुटी,बिगुल,वंशी की शोभा अनुपम
नन्ही-नन्ही उँगलियाँ और उसके बीच
शोभित दधी-भात का है वो कौर प्रथम।
ये रूप लावण्य से पूरित यह गोप वेश
इसके अतिरिक्त प्रभु कौन पूज्य शेष
हे नंद नंदन, हे व्रजराज कुमार करूँ मैं
स्तुति आपकी,मिट जाए मेरा क्लेश।

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